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इंतज़ार

रात ढलती जा रही अब,
शमां सिसक रही है सारी शब|
चाँद बादलों मैं छुपा जा रहा है अब,
तारों का जाल बढ़ता ही जा रहा अब|

किवाड़ की हल्की आहट हुई है अब,
शायद कोई आ रहा है अब|
पर यह क्या, यह तो हवा का झोका था तब,
इंतज़ार मैं डूबी है शब|

गोरे-गोरे गालों पर गिरते हुए आँसू,
और घुट-घुट कर सिसकना हे रब|
कोई इंतज़ार करे रात के अंधेरे में,
अब, तब और कब-कब|

~हरि मोहन भटनागर ‘हरि’

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