Featured, Hindi, Poetry, Tulika by Hari

अंतर

जब तू नही तो यह ज़मी नही;
और आसमान भी नही|
चाँद नही, तारे भी नही;
और सूरज भी नही|
ज़िंदगी, ज़िंदगी ही नही;
और प्यार, प्यार ही नही|
चाँद की चाँदनी भी नही;
सूरज की रोशनी ही नही|
दरिया की मौज भी नही;
साज़ मे सोज़ भी नही|

पर तेरे होने से आ जाती है;
सब और बहार ही बहार|
यह ज़मी ढक जाती है फूलों से;
और सब तरफ़ बहार ही बहार|
चाँद की चाँदनी खिल उठती है सब ओर;
सूरज की रोशनी नज़र आती है सब ओर|
चाँद और तारे भी चमक उठते हैं आसमाँ पर;
ज़िंदगी और ज़िंदगी खिलखिला उठती है सभी ओर|
काश! तू आती रहे और कभी जाने का नाम ना ले;
जिस तरह शमां जलती रहे पर बुझने का कभी नाम न ले|

~हरि मोहन भटनागर ‘हरि’

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