Featured, Hindi, Poetry, Tulika by Hari

अंतर

जब तू नही तो यह ज़मी नही;
और आसमान भी नही|
चाँद नही, तारे भी नही;
और सूरज भी नही|
ज़िंदगी, ज़िंदगी ही नही;
और प्यार, प्यार ही नही|
चाँद की चाँदनी भी नही;
सूरज की रोशनी ही नही|
दरिया की मौज भी नही;
साज़ मे सोज़ भी नही|

पर तेरे होने से आ जाती है;
सब और बहार ही बहार|
यह ज़मी ढक जाती है फूलों से;
और सब तरफ़ बहार ही बहार|
चाँद की चाँदनी खिल उठती है सब ओर;
सूरज की रोशनी नज़र आती है सब ओर|
चाँद और तारे भी चमक उठते हैं आसमाँ पर;
ज़िंदगी और ज़िंदगी खिलखिला उठती है सभी ओर|
काश! तू आती रहे और कभी जाने का नाम ना ले;
जिस तरह शमां जलती रहे पर बुझने का कभी नाम न ले|

~हरि मोहन भटनागर ‘हरि’

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सिर्फ मैं

ज़पिघले नीलम सा बहता हुआ यह समां,
नीली नीली सी खामोशियाँ,
न कहीं है ज़मीन,
न कहीं आसमां,
सरसराती हुयी टहनियां, पत्तियां,
कह रही हैं की बस एक तुम हो यहाँ,
सिर्फ मैं हूँ मेरी सांसें हैं और मेरी धडकनें,
ऐसी गहराइयाँ,
ऐसी तनहाइयाँ,
और मैं, सिर्फ मैं,
अपने होने पे मुझको यकीन आ गया|

~जावेद अख़्तर

 

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इंतज़ार

रात ढलती जा रही अब,
शमां सिसक रही है सारी शब|
चाँद बादलों मैं छुपा जा रहा है अब,
तारों का जाल बढ़ता ही जा रहा अब|

किवाड़ की हल्की आहट हुई है अब,
शायद कोई आ रहा है अब|
पर यह क्या, यह तो हवा का झोका था तब,
इंतज़ार मैं डूबी है शब|

गोरे-गोरे गालों पर गिरते हुए आँसू,
और घुट-घुट कर सिसकना हे रब|
कोई इंतज़ार करे रात के अंधेरे में,
अब, तब और कब-कब|

~हरि मोहन भटनागर ‘हरि’

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